
न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 11 Oct. 2026, संपादक की कलम से… आज के सोशल मीडिया और डिजिटल युग में यह एक प्रचलित व्यंग्य या यथार्थ है कि हर व्यक्ति बिना किसी औपचारिक डिग्री या विशेषज्ञता के हर विषय पर अपनी राय रखता है। सोशल मीडिया का प्रभाव: इंटरनेट और स्मार्टफोन के दौर में हर कोई अपनी बात, वीडियो या पोस्ट के जरिए खुद को पत्रकार समझता है। आज के इस आधुनिक युग में बदलते सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में आज का आदमी आवश्यकता से कई गुना अधिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा हुआ है। वही जिसमें देखने को मिलेगा कि हर आदमी पत्रकार है, हर आदमी राजनीतिक विश्लेषक है, हर आदमी वैद्य से लेकर वैज्ञानिक तक है।
साथ ही आज इस दौर में सोशल मीडिया का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है,आदमी की जिम्मेदारियाँ भी वैसे-वैसे बढ़ती जा रही हैं। आदमी एक है,जिम्मेदारियाँ अनेक।सचमुच बड़ा अन्याय हो रहा है आदमी के साथ। जिसमें हमारे पड़ोसी देश से लेकर अंतरिक्ष तक कहीं कुछ घट जाए, आधुनिक,सजग,सतर्क और बुद्धिजीवी आदमी को तत्काल प्रतिक्रिया देनी पड़ती है। कहीं खुशी जतानी है,कहीं बधाई देनी है, तो कहीं अफसोस करना है और कहीं दो लाइन का विश्लेषण ठेलना है। अगर आप नई बाइक खरीदी तो दुनिया को बताना जरूरी है। नया कपड़ा,चश्मा या घड़ी आई तो उसकी तस्वीर डालकर आशीर्वाद लेना जरूरी है।
वही, मंदिर,मस्जिद,चर्च या गुरुद्वारे पहुँच गए तो दर्शन से पहले जनता को सूचना देनी है कि “ऊपर वाले की कृपा से आज फलाने स्थान के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।” दोस्त के यहाँ पार्टी में गए और मेज पर पनीर,चिकन या मटन सज गया तो पहले कैमरा खाएगा,फिर आदमी खाएगा।
इस दौर में हर कोई फोटो फेसबुक पर डालकर भोजन को लजीज़ घोषित कर दिया। बाद में खाते हुए पता चला कि पनीर या मटन में स्वाद ही नहीं है।
कोई बात नहीं...मन को यह कहकर समझा लेंगे कि चलो,मटन भले बेस्वाद था,फोटो तो लजीज़ आई है,पैसा फेसबुक से वसूल हो गया। सबसे कठिन जिम्मेदारी तो भावनाओं की है। पड़ोसी की नानी की बहन के दामाद के भाई की बुआ का एक्सीडेंट में निधन हो गया,अब दुख मनाना है,श्रद्धांजलि देनी है,संवेदना जतानी है।यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि तकनीक ने अधिकार और मंच तो सबको दे दिया है, लेकिन ज्ञान और विशेषज्ञता की सीमाओं को धुंधला कर दिया है



