उत्तराखंड

23 मई को मनाई जायेगी वैशाख पूर्णिमा : डॉक्टर आचार्य सुशांत राज!

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उत्तराखण्ड : 22 मई 2024 , देहरादून। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की 23 मई 2024, गुरुवार को बुद्ध पूर्णिमा हैं। हर माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के अगले दिन पूर्णिमा मनाई जाती है। ऐसे में 23 मई को वैशाख पूर्णिमा है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख पूर्णिमा तिथि को हुआ था। वैशाख पूर्णिमा का व्रत और स्नान-दान एक ही दिन है. वैशाख पूर्णिमा कल 23 मई को है. वैशाख पूर्णिमा की तिथि 23 मई को 07:22 पीएम तक है। वैशाख पूर्णिमा जिसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस पूर्णिमा व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन की कामनाएं पूरी हो जाती हैं। वैशाख माह में आने वाली पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा और पीपल पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। इसलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, बुद्ध पूर्णिमा के दिन गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था जिन्हें भगवान विष्णु का दसवां अवतार भी मानते हैं। इसी पूर्णिमा के दिन इन्हें ज्ञान की प्राप्ति भी हुई थी और इसी दिन उन्हें मोक्ष की प्राप्ति भी हुई थी। हिंदू धर्म में गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का दसवांअवतार माना जाता है।
बुध पूर्णिमा 23 मई गुरुवार को रात में 7 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। ऐसे में वैशाख पूर्णिमा का व्रत 23 मई किया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा का व्रत प्रदोषकाल में रखने का महत्व है। इसका अर्थ है कि पूर्णिमा व्रत प्रत्येक मास की प्रदोषव्यापिनी और चंद्रोदय व्यापिनी पूर्णिमा में किया जाना चाहिए। इस व्रत को प्रदोषकाल में करने का विधान हैं। अर्थात् पूर्णिमा दोनों दिन प्रदोष में व्याप्त हो, तो अगले दिन तथा दोनों दिन प्रदोषकाल की व्याप्ति के अभाव में भी अगले दिन ही व्रत हेतु ग्रहण करें। 23 मई, 2024 ई. को प्रदोष के प्रारम्भक्षण (सूर्यास्तकाल) को स्पर्शमात्र कर रही है। इसलिए कहा जा रहा कि 23 मई को वैशाख पूर्णिमा व्रत करना चाहिए।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख मास में भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। जीवन में सुख शांति और समृद्धि आती है।
वैशाख पूर्णिमा पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठें और सुबह स्नान आदि के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें।
इसी के साथ व्रत का संकल्प लें और फिर पानी का घड़ा किसी ब्राह्मण को दान दें।
इसके बाद शाम में समय सत्यनारायण कथा का पाठ करें इसके लिए कसार का प्रसाद और चरणामृत जरुर बनाए। भगवान विष्णु को भोग लगाएं और फिर ब्रह्माण को भोजन कराने के बाद ही अपना व्रत खोले।

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