
न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 12 Sep. 2026, जानकारी के मुताबिक इस जमाने में भला 2 करोड़ में भी कोई फ़िल्म बनती है ? जी हाँ,बन गई हनुमान अंश।कैंची धाम वाले बाबा नीम करौली पर बनी इस फिल्म ने 100 करोड़ कमाई का आंकड़ा पार कर लिया है।सिनेमाघर मंदिर में बदल गए हैं,हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा है,बहुत से लोग जूते उतार कर फिल्म देख रहे हैं।सिनेमाघरों में बजरंगबली का प्रसाद बंट रहा है।
युवाओं में दीवानगी की हद देखिए कि शनिवार रविवार को तमाम सिनेमाघरों,मल्टीप्लेक्स में हाउसफुल के बोर्ड लटके थे।बाबा फिल्म देखने आएंगे ऐसा मानकर 9 नंबर की सीट बाबा के लिए खाली रखी जा रही है।जेन मिलेनियम,जेन जी और जेन अल्फ़ा फिल्म में भरे पड़े हैं।युवाओं के दम पर लो बजट फिल्म के वारे न्यारे हो गए हैं।फिल्म अभी कई हफ़्ते धूम मचाएंगी,इसके पूरे आसार हैं।ऐसा भी कहीं होता है ? मानों जय संतोषी मां वाला दौर लौट आया हो !
आज भी जड़ों की ओर लौट रहा है युवा …आधुनिकता की रफ्तार के बीच अध्यात्म से जुड़ रही नई पीढ़ी …एक दौर था जब यह मान लिया गया था कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपरा और अध्यात्म से कोई खास लगाव नहीं है।मोबाइल की स्क्रीन,इंटरनेट,ग्लोबल कल्चर और पश्चिमी जीवनशैली में पली-बढ़ी जेन जी को अक्सर अपनी जड़ों से दूर जाती पीढ़ी के रूप में देखा गया।
लेकिन इस फिल्म से तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।युवा आधुनिकता को अपना रहा है,लेकिन अपनी पहचान छोड़ना नहीं चाहता।वह दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है,मगर अपनी मिट्टी की खुशबू भी महसूस करना चाहता है।यही बदलाव आज भारतीय समाज में सबसे दिलचस्प सांस्कृतिक घटनाओं में से एक है।उसे नीट आंदोलन में भी रुचि है,राजनीति में भी और हनुमान अंश जैसी फिल्म में भी।
हनुमान_अंश जैसी फिल्मों और भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित आधुनिक प्रस्तुतियों को युवाओं से मिलने वाला उत्साह इसी बदलते माहौल की ओर संकेत करता है।यहां बात केवल किसी फिल्म के चलने या लोकप्रिय होने की नहीं है।बड़ा सवाल यह है कि आखिर नई पीढ़ी को अपनी पुरानी कथाओं और आध्यात्मिक प्रतीकों में फिर से आकर्षण क्यों दिखाई देता है ?
शायद इसलिए कि आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो बहुत दीं,लेकिन सवाल भी बहुत दिए हैं।आज का युवा पहले से अधिक स्वतंत्र है,अधिक जानकारी रखता है और दुनिया से सीधे जुड़ा हुआ है।उसके पास हर विषय पर हजारों विकल्प हैं।लेकिन इसी सूचना और विकल्पों की भीड़ में वह अपने अस्तित्व,अपनी पहचान और अपने जीवन के अर्थ को लेकर भी सवाल करता है।
ऐसे में हनुमान केवल एक धार्मिक पात्र नहीं रह जाते।वे साहस,समर्पण,अनुशासन और आत्मविश्वास के प्रतीक बन जाते हैं।राम केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक संदर्भ नहीं रहते,बल्कि मर्यादा और कर्तव्य की अवधारणा बन जाते हैं। कृष्ण केवल पुराणों के पात्र नहीं रहते,बल्कि जीवन के संघर्षों के बीच कर्म और विवेक की प्रेरणा बन जाते हैं।
यही भारतीय अध्यात्म की शक्ति है।वह समय के साथ अपनी भाषा बदल सकता है,लेकिन अपना मूल संदेश नहीं खोता। आज का युवा मंदिर जा रहा है तो वह स्टार्टअप भी बना रहा है।वह योग और ध्यान की बात करता है तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी सीख रहा है।वह भारतीय संगीत सुनता है तो अंतरराष्ट्रीय संगीत का आनंद भी लेता है।उसके लिए परंपरा और आधुनिकता विरोधी ध्रुव नहीं हैं।
इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है—युवा अब अपनी संस्कृति को केवल विरासत के रूप में नहीं,अपनी पहचान के रूप में देखना चाहता है।वह यह जानना चाहता है कि उसके पूर्वज कौन थे,उनकी सोच क्या थी,उनके दर्शन में जीवन को देखने का तरीका क्या था और भारतीय सभ्यता करोड़ों वर्षों तक कैसे जीवित रही।यह जिज्ञासा महत्वपूर्ण है।जेन जी और जेन अल्फ़ा भविष्य की उड़ान भरते हुए,अतीत की खोज में जुटे हैं।जो लोग उसे बरगलाने के ख्वाब देखते हैं,वे अंधेरे में हैं।
सोशल मीडिया ने भी इस बदलाव को एक नया मंच दिया है।आज रामायण,महाभारत, योग,भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक विचार केवल पुस्तकों या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं हैं।वे छोटे वीडियो,पॉडकास्ट,फिल्मों और डिजिटल कंटेंट के माध्यम से करोड़ों युवाओं तक पहुंच रहे हैं।
#सीताराम



