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डिजिटल युग में लोक संस्कृति के संरक्षण और वैश्विक प्रसार पर हुआ मंथन

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उत्तराखंड: 08 Sep. 2026, देहरादून। उत्तराखंड श्रीनगर गढ़वाल,  हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, बिड़ला परिसर द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पॉप कल्चर’ के दूसरे दिन लोक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन, नवाचार और वैश्विक प्रसार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ। दूसरे दिन के तृतीय अकादमिक सत्र एवं समापन सत्र में लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने शोध-पत्रों का वाचन किया।
दूसरे दिन के तृतीय अकादमिक सत्र का शुभारंभ प्रातः 10 बजे हुआ। सत्र की अध्यक्षता प्रो. डी. एस. नेगी, निदेशक, एमएमटीसी ने की तथा संचालन डॉ. अनूप सेमवाल ने किया। सत्र में उत्तराखंड के युवा लोक कलाकार श्री अरविंद चौहान एवं श्री अनुराग नौटियाल को उत्तराखंड की लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान के लिए प्रतीक चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इस दौरान  मुख्य अतिथि डॉ. अजय कुमार सिंह ने अपने संबोधन में संगोष्ठी के विषय की गंभीरता और संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए नवाचार को संस्कृति का प्रमुख तत्व बताया। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति को रूढ़ियों में बांधने के बजाय उसमें प्रवाहशीलता और परिवर्तनशीलता बनाए रखना आवश्यक है उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है। इसके लिए योजनाबद्ध और निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने लोक संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने पर भी बल दिया। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को समर्पित गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। इसके पश्चात विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों द्वारा विविध विषयों पर 15 शोध-पत्रों का वाचन किया गया।
साथ ही डिजिटल माध्यम लोक संस्कृति के संरक्षण का सशक्त माध्यम : प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी, प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। डिजिटल तकनीक ने इसके संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रसार की संभावनाओं को कई गुना बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि लोक कलाओं को उनके मूल संदर्भ और प्रामाणिकता के साथ डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।
सत्र का संचालन डॉ. अनूप सेमवाल ने किया। समापन अवसर पर हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके पश्चात संगोष्ठी के संयोजक डॉ. कपिल देव पंवार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, आयोजन समिति के सदस्यों, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि सभी के सहयोग एवं सहभागिता से संगोष्ठी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। उन्होंने संगोष्ठी के विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भविष्य में भी इस प्रकार के अकादमिक प्रयास जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के औपचारिक समापन की घोषणा की।

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