
उत्तराखंड: 20 JUNE 2026, शनिवार को देहरादून / राजधानी स्थित प्राप्त जानकारी के मुताबिक उत्तराखंड में लैंड जिहाद, लव जिहाद और थूक जिहाद जैसे मुद्दों पर सरकार की सख्त कार्रवाई के बाद अब कथित “नौकरी जिहाद” का मामला सामने आया है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र भेजकर राज्य में 28 साल पुरानी नियुक्तियों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। विकेश सिंह नेगी का आरोप है कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1994-95 में सृजित अस्थायी/अधिसंख्य (Supernumerary) उर्दू अनुवादक-कनिष्ठ लिपिक पदों की अवधि 28 फरवरी 1996 को समाप्त हो चुकी थी, इसके बावजूद कई विभागों में संबंधित कर्मचारी गैरकानूनी तरीके से आज भी कार्यरत हैं।
जबकि उत्तराखंड में सैंकड़ों प्रशिक्षित बेरोजगार युवा हैं। जिनकी इन पदों पर चयन हो सकती थी। विकेश सिंह नेगी ने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से पूर्व के मुख्यमंत्रियों से भी उन्होनें इस मामले की शिकायत की लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब उन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उम्मीदें हैं कि वह नौकरी जिहाद के मुद्दे पर कड़ा एक्शन लेंगें। विकेश नेगी ने कहा कि नौकरी खत्म होने के बाद भी उच्चाधिकारियों से सेंटिंग गेटिंग के आधार पर सभी कर्मचारी प्रमोशन लेते रहे और आज भी नौकरी पर बरकरार हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली की सराहना करते हुए कहा कि धामी सरकार ने लैंड जिहाद, लव जिहाद और थूक जिहाद जैसे मामलों में कठोर कदम उठाकर प्रदेश में कानून के राज का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि कथित “नौकरी जिहाद” जैसे गंभीर आरोपों की भी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए ताकि सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
1996 में समाप्त होनी थी पदों की अवधि–मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत में विकेश सिंह नेगी ने उल्लेख किया है कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1994-95 में उर्दू अनुवादक सह कनिष्ठ लिपिक पदों का सृजन किया गया था। शासनादेश संख्या 80 सी०एम०/47-का4-94-10/10/10/94 के अनुसार, जहां नियमित कनिष्ठ लिपिक का पद उपलब्ध नहीं था, वहां अधिसंख्य पद सृजित किए गए थे।
इन पदों की वैधता 28 फरवरी 1996 तक अथवा प्रथम रिक्ति होने तक, जो भी पहले हो, निर्धारित की गई थी। सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी का आरोप है कि इन पदों की वैधानिक अवधि समाप्त होने के बावजूद कुछ कर्मचारी आज भी विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत हैं। उनका दावा है कि उत्तराखंड गठन से पहले की गई इन नियुक्तियों के कर्मचारी वर्तमान में पुलिस विभाग, जिलाधिकारी कार्यालयों, तहसीलों, विकासखंड कार्यालयों, जिला आबकारी विभाग तथा अन्य सरकारी संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं।
आरटीआई दस्तावेजों का हवाला–सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त अभिलेखों और सूचनाओं के आधार पर यह मामला सामने आया है। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ कर्मचारियों ने न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त किए थे, लेकिन कई मामलों में स्थगन समाप्त होने के बाद भी सेवाएं जारी रहने की बात सामने आई है। ऐसे मामलों में विभागीय अभिलेखों और सेवा पुस्तिकाओं की विस्तृत जांच आवश्यक है।
वित्तीय नुकसान की भी आशंका–शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि यदि नियुक्तियां शासनादेश के विपरीत पाई जाती हैं तो इससे राज्य सरकार को वर्षों तक वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा हो सकता है। ऐसे में न केवल नियुक्त कर्मचारियों की स्थिति की समीक्षा जरूरी है, बल्कि उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए जिन्होंने कथित रूप से नियमों के विपरीत सेवा निरंतरता प्रदान की। सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी का कहना है कि सरकारी सेवाओं में नियमों का पालन सर्वोपरि होना चाहिए और किसी भी स्तर पर अनियमितता पाए जाने पर निष्पक्ष कार्रवाई होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता है।
मुख्यमंत्री से की तीन प्रमुख मांगें–पुष्कर सिंह धामी को भेजे गए पत्र में विकेश सिंह नेगी ने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। सरकार के सामने नई चुनौती–प्रदेश में भर्ती घोटालों और नियुक्तियों को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में विकेश सिंह नेगी द्वारा उठाया गया यह नया मामला सरकार और प्रशासन के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस शिकायत पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या वास्तव में कथित “नौकरी जिहाद” के आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाती है।



