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खुली किताब परीक्षा : युवा भारत के लिए एक नई चुनौती : डॉ दीक्षित

उत्तराखंड:12 अगस्त 2025,मंगलवार को देहरादून । डॉ रवि शरण दीक्षित  के अनुसार सीबीएससी की शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा नौवीं के छात्रों के लिए खुली किताब लेकर परीक्षा देना प्रस्तावित है। छात्रों पर परीक्षा के तनाव को कम करने के मकसद से सीबीएसई अगले सत्र से ओपन बुक असेसमेंट (ओबीए) योजना शुरू करने जा रहा है। इसमें प्रस्तावित है कि छात्रों में रटने की जरूरत नहीं रह जाएगी और वे योग्यता-आधारित शिक्षा ले सकेंगे।

पाठ्यक्रम समिति के प्रस्ताव के मुताबिक हर सत्र में तीन प्रमुख विषयों, भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के लिखित पेपर में खुली किताब लेकर बच्चे परीक्षा दे सकेंगे। 2025 जून में हुई बैठक में ये निर्णय लिया था। यह निर्णय एक पायलट स्टडी पर आधारित है जिसमें अतिरिक्त पठन सामग्री को शामिल नहीं किया गया और पाठ्यक्रम से संबंधित विषयों का परीक्षण किया गया।
इसमें छात्रों को 12 प्रतिशत से लेकर 47 प्रतिशत के बीच अंक प्राप्त हुए। इससे संसाधनों के प्रभावी उपयोग और अंत:विषय अवधारणाओं को समझने में आने वाली चुनौतियों का पता चला।

गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए, सीबीएसई सैंपल पेपर भी तैयार करेगा और छात्रों को संदर्भ सामग्री को समझने के लिए मार्गदर्शन भी दिया जाएगा। इन सभी प्रस्तावों के साथ इस बात को समझने की गहन रूप से आवश्यकता है की छात्रा का मानसिक और अध्ययन स्तर अभी उसे स्तर पर नहीं है की नवी से 12वीं के छात्र ओपन स्टडी के महत्व को समझ पाए इसी के साथ-साथ यह भी समझना होगा कि 100 छात्रों के सैंपल सर्वे में सभी छात्रों का मानसिक स्तर एक जैसा नहीं होता कुछ विशेष रूप से तेज होते कुछ विशेष रूप से कमजोर होते हैं और ज्यादा संख्या औसत छात्राओं की होती है।

निश्चित ही औसत छात्र छात्रों में गहराई से सोचने के लिए पढ़ाई का दबाव होना भी आवश्यक है तथा सतत उसकी पढ़ाई भी आवश्यक है और उसे स्थिति में अगर यह उन्हें ज्ञात हो जाए की किताब मिल सकती है परीक्षा के दौरान तो निश्चित ही वे पढ़ाई पर कम ध्यान देंगे और यह एक नए तरह की स्थिति उत्पन्न कर देगा जो आगे की पढ़ाई में एक भय पैदा कर देगी कि बिना पुस्तक के आगे कैसे पढ़ाई की जाएगी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लर्निंग पर स्केल पर आधारित लर्निंग पर जोर दे रही है।, आवश्यकता स्कूल स्तर पर माध्यमिक शिक्षा में स्किल का विकास करना है ना कि इस तरह के प्रयोग करना यह छात्र-छात्राओं को भ्रमित भी कर करेगा।

विदेश में भी ओपन बुक व्यवस्था लागू है परंतु वह उन छात्र/ छात्राओं पर है जो कॉलेज स्तर पर है और जिनकी समझ का स्तर भी पूर्णत विकसित हो चुका होता है। सपुस्तक पुस्तक परीक्षा की अध्ययन आधार हेतु शिक्षक, अभिभावक और छात्रों के मानसिक स्तर को भी उसे स्तर पर लाना होगा। जबकि अभिभावक इस मानसिक स्थिति में नहीं आ पाते हैं की छात्र/छात्रा पुस्तक के साथ परीक्षा दें जब वह इस के महत्व को समझें, उनकी नजर में प्रयोग भी सफल होने पर प्रश्न चिन्ह रहेगा और निश्चित ही यह स्कूल स्तर पर संभव नहीं प्रतीत होता।

और अंत में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1987 वर्ष में इस तरह की परीक्षा लागू की गई थी जिसमे मैंने स्वयं परीक्षा दी थी जिसमें अगले वर्ष बाल मन, को हाई स्कूल की परीक्षा देने में सहजता महसूस नहीं हो रही थी। और यह भी लग रहा था कि अब बिना पुस्तक के आगे कैसे पढ़ाई होगी, करियर कैसे बढ़ेगा और इसकी परिणीति परिणाम के नुकसान के रूप में हाई स्कूल में स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

सरकार को इस तरह के प्रयासों को बहुत गंभीरता से देखना चाहिए यह पायलट प्रोजेक्ट की तरह नहीं चलाई जाने चाहिए प्राथमिक माध्यमिक शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम की पुनर संरचना करने की जरूरत है जिससे उनकी कौशल का विकास हो और एक सहज भाव हो।

डॉ रवि शरण दीक्षित

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