उत्तराखंडपौड़ी गढ़वालसामाजिक

हिमालयी क्षेत्र औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती का बन सकता है प्रमुख केंद्र: डॉ. दधिच

Spread the love

 उत्तराखंड: 05 Oct. 2026, श्रीनगर (गढ़वाल), हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर (गढ़वाल),  के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र में सोमवार को राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, भारत सरकार की परियोजना के अंतर्गत दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी में हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय चुनौतियों, बदलते भू-उपयोग एवं भू-आवरण, जलवायु परिवर्तन, कृषि, औषधीय पादप संसाधनों और ग्रामीण आजीविका से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने शोध को केवल अकादमिक प्रकाशनों तक सीमित न रखकर स्थानीय समुदायों और गांवों की वास्तविक समस्याओं के समाधान से जोड़ने पर जोर दिया।

राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली के सीईओ डॉ. महेश के. दधिच ने कहा कि औषधीय एवं सुगंधित पौधों के क्षेत्र के विकास के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक कार्यों से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, जैविक एवं टिकाऊ खेती, बेहतर बाजार व्यवस्था और युवा उद्यमिता को इस क्षेत्र के विकास के प्रमुख आधार बताया। डॉ. दधिच ने कहा कि उपयुक्त मौसम, अच्छी भूमि, गुणवत्तापूर्ण जल और उत्तम बीज औषधीय पौधों की गुणवत्ता और उत्पादकता निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण घटक हैं। हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक एवं पारिस्थितिकी परिस्थितियां उच्च गुणवत्ता वाले औषधीय और सुगंधित पौधों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। ऐसे में यह क्षेत्र औषधीय पादप खेती का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता रखता है।

उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में जैविक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने युवाओं से औषधीय एवं सुगंधित पौधों के क्षेत्र में उद्यमिता अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह क्षेत्र रोजगार, स्वरोजगार और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध करा सकता है।

इस दौरान विशिष्ट अतिथि गढ़वाल विश्वविद्यालय के डीन रिक्रूटमेंट एवं पदोन्नति प्रो. मोहन सिंह पंवार ने हिमालय की भौगोलिक एवं पारिस्थितिक संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला।उन्होंने पारंपरिक मिश्रित खेती के स्थान पर बढ़ते एकल फसल चलन को कृषि विविधता और हिमालयी कृषि की लचीली क्षमता के लिए चुनौती बताया। साथ ही गुणवत्तापूर्ण पौध रोपण सामग्री की कमी को कृषि एवं बागवानी विकास में प्रमुख बाधाओं में शामिल किया।

साथ ही उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति डॉ. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था में अब बीमारी के उपचार के साथ स्वास्थ्य संवर्धन पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है। इससे गुणवत्तापूर्ण औषधीय पादप कच्चे माल और प्रमाणित हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ रही है।  इसलिए औषधीय पादप सामग्री के संग्रह, रखरखाव और प्रसंस्करण के लिए वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित मानक विकसित किए जाने जरूरी हैं। इस मौके पर कुलसचिव प्रो. वाईपी रैवानी, डीन एग्रीकल्चर एंड एलाइड साइंस प्रो. आरएस नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओपी गुसांई, बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. एचबीएस चैहान, प्रो. एमएम सेमवाल के साथ हैप्रेक के निदेशक प्रो. विजयकांत पुरोहित, डाॅ. बबिता पाटनी, संगोष्ठी की सचिव डाॅ. विजयलक्ष्मी त्रिवेदी, जन संपर्क अधिकारी आशुतोष बहुगुणा सहित आदि मौजूद थे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button