उत्तराखंड में मिलावटखोरी पर सवाल, त्योहारों के बाद कहां गायब हो जाता है विभाग?

देहरादून: त्योहारों का सीजन आते ही प्रदेश के बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, लेकिन इसके साथ ही एक डरावनी सच्चाई भी सामने आने लगती है—मिलावट का काला बाजार। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, दशहरा और ईद जैसे बड़े पर्वों पर मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग आसमान छूने लगती है। मांग बढ़ते ही मुनाफाखोर सक्रिय हो जाते हैं और जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ का खेल शुरू हो जाता है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग, उत्तराखंड सिर्फ त्योहारों के आने पर ही नींद से जागता है? साल के बाकी महीनों में विभाग का ढुलमुल रवैया आखिर क्यों देखने को मिलता है?
त्योहारों पर ही क्यों होती है छापामारी?
त्योहारों के नजदीक आते ही खाद्य सुरक्षा विभाग की टीमें अचानक एक्शन मोड में आ जाती हैं। बाजारों में निरीक्षण, दुकानों पर ताबड़तोड़ छापे और संदेह के आधार पर खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर प्रयोगशाला में भेजने का दौर शुरू हो जाता है। विभाग का दावा है कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा।
लेकिन जनता और उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह सब महज एक खानापूर्ति और दिखावा बनकर रह गया है।
सांठगांठ और दबाव का खेल? उठ रहे बड़े सवाल!
त्यوहारों के नाम पर होने वाली इन कार्रवाईयों को लेकर व्यापारियों और आम जनता के बीच कई तरह की चर्चाएं गर्म हैं। क्या त्योहारों के नाम पर व्यापारियों पर दबाव बनाने और उनके साथ अधिकारियों की सांठगांठ कहें या कोई और मंशा, इसके पीछे की असल सच्चाई क्या है?
यह सवाल हर साल चर्चा का विषय बनता है कि आखिर क्यों इस पूरे तंत्र के पीछे ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है जिससे व्यापारी डरे रहें और अधिकारी भी खुश रहें। अधिकारियों के इस संदिग्ध रवैये पर अब हर तरफ से बड़े सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह सब सिर्फ एक सुनियोजित खेल बनकर रह गया है?
क्या कहते हैं जमीनी हालात और गंभीर आरोप?
स्थानीय लोगों और उपभोक्ताओं का आरोप है कि विभाग की ये छापेमारियां सिर्फ कागजी कार्रवाई या औपचारिकता निभाने तक सीमित हैं। कई गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं:
दिखावे की कार्रवाई: त्योहारों के नाम पर कुछ चुनिंदा दुकानों पर औपचारिकता निभाकर विभाग अपनी पीठ थपथपा लेता है, जबकि सालभर मिलावटखोर बेखौफ अपना धंधा चलाते हैं।
एक्सपायरी डेट वाले रंग और केमिकल्स का खेल: सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कई बेकरी और मिठाई विक्रेताओं द्वारा खाद्य पदार्थों में ऐसे रंगों और केमिकल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो या तो एक्सपायरी डेट के होते हैं या स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं।
अधिकारियों की जानकारी में सब कुछ? चर्चा आम है कि इन तमाम अवैध गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहते हैं।
मिठाई की ट्रे पर निर्माण और एक्सपायरी डेट अनिवार्य
इन तमाम सवालों के बीच, विभाग ने मिठाई की दुकानों और बेकरी प्रतिष्ठानों के लिए कुछ विशेष निर्देश जरूर जारी किए हैं। इसके तहत:
ट्रे पर डेटिंग अनिवार्य: मिठाई की हर ट्रे पर निर्माण तिथि (Manufacturing Date) और अवसान तिथि (Expiry Date) अंकित करना अनिवार्य कर दिया गया है।
पारदर्शिता की पहल: इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि उपभोक्ताओं को यह साफ-साफ पता चल सके कि मिठाई कब तैयार हुई है और वह कितने समय तक उपभोग के लिए सुरक्षित है।
पुरानी मिठाइयों पर लगाम: इससे पुरानी और बासी मिठाइयों की धड़ल्ले से होने वाली बिक्री पर प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी।
जनता की दो टूक: सिर्फ निर्देश नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए!
नियम कागजों पर भले ही सख्त नजर आएं, लेकिन जब तक इनका पालन सख्ती से धरातल पर नहीं उतरता, तब तक आम जनता की सेहत खतरे में ही रहेगी। सिर्फ त्योहारों के समय चमक-दमक दिखाने वाले छापों से मिलावट का यह खेल बंद होने वाला नहीं है।
अब देखना यह होगा कि क्या खाद्य संरक्षा विभाग सिर्फ त्योहारों के नाम पर खानापूर्ति करता रहेगा या फिर सालभर लगातार कड़ी कार्रवाई कर मिलावटखोरों की कमर तोड़ने का काम करेगा? जनता की नजरें अब विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं!



