
उत्तराखंड: 03 Oct. 2026, देहरादून / राजधानी स्थित दून के कोरोनेशन अस्पताल की इमरजेंसी में लापरवाही की हदें पार: सरकारी सुविधा होते हुए मरीजों को भेजा जा रहा निजी सेंटर, ईसीजी और मेडिकल के नाम पर खेल! प्राप्त जानकारी के मुताबिक राजधानी के प्रमुख पंडित दीनदयाल उपाध्याय (कोरोनेशन) जिला अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्थाएं इन दिनों भगवान भरोसे चल रही हैं। जहां एक ओर गंभीर और परेशान हाल मरीज अपनी जान बचाने की उम्मीद लेकर इमरजेंसी पहुंचते हैं, वहीं दूसरी ओर यहां तैनात कुछ लापरवाह डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की कार्यप्रणाली सरकारी दावों की पोल खोल रही है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, नाइट ड्यूटी के दौरान ईएमओ (EMO) डॉक्टर, फार्मासिस्ट, नर्सिंग अधिकारी और सफाई कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं।
सरकारी मशीन होने के बावजूद प्राइवेट सेंटर Meditrina भेजा मरीज-प्राप्त जानकारी के मुताबिक हाल ही में इसका एक ताजा और गंभीर मामला सामने आया है, जब सुबह करीब 6 बजे दो गंभीर मरीज इलाज के लिए कोरोनेशन अस्पताल की इमरजेंसी पहुंचे। इनमें से एक मरीज को अत्यधिक घबराहट की शिकायत थी। डॉक्टर ने बीपी चेक करने के बाद मरीज को ईसीजी (ECG) करवाने के लिए कहा। जब मरीज के परिजनों ने इमरजेंसी में ईसीजी मशीन के बारे में पूछा, तो ड्यूटी पर तैनात EMO डॉक्टर ने सरकारी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद यह कहकर टरका दिया कि “अस्पताल के ऊपर बने प्राइवेट हार्ट मेटरनिटी सेंटर में जाकर ईसीजी करवा लाएं।” मजबूरन, पीड़ित परिवार को कोरोनेशन के प्राइवेट सेंटर Meditrina में 200 रुपये शुल्क देकर ईसीजी करानी पड़ी। सवाल यह उठता है कि जब अस्पताल की इमरजेंसी में ईसीजी जैसी जीवनरक्षक मशीनें मौजूद हैं, तो मरीजों को गुमराह कर निजी सेंटरों में क्यों भेजा जा रहा है?
मेडिकल बनवाने में भी पैसों का खेल!
- सूत्रों का यह भी दावा है कि केवल जांच ही नहीं, बल्कि इमरजेंसी में मेडिकल रिपोर्ट (Medico-Legal Report) बनाने के नाम पर भी अवैध वसूली का खेल खेला जा रहा है। मरीजों और तीमारदारों से नियमों को ताक पर रखकर पैसों की मांग की जाती है, जिससे आम जनता को दोहरी मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
प्राथमिक सुविधाओं का अभाव: आपातकालीन सेवाओं में आने वाले हर मरीज के लिए ईसीजी सबसे अहम प्रारंभिक जांच है, लेकिन इसके बावजूद मरीजों को दर-दर भटकना पड़ रहा है।
नाइट ड्यूटी पर लापरवाही: रात और सुबह की पाली में तैनात ईएमओ डॉक्टरों और स्टाफ की मनमानी से मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है। -
निजी अस्पतालों से साठगांठ: सरकारी संसाधनों के होने के बावजूद मरीजों को निजी सेंटरों का रुख करने के लिए मजबूर करना किसी बड़े रैकेट की ओर इशारा करता है।
आम जनता और तीमारदारों ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। साथ ही, कोरोनेशन अस्पताल की इमरजेंसी में नाइट ड्यूटी के दौरान मनमानी करने वाले डॉक्टरों और लापरवाह स्टाफ के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि गरीबों को समय पर मुफ्त और सुलभ इलाज मिल सके। -
इस तरह की स्थिति बेहद चिंताजनक और गंभीर है। जिला अस्पताल या सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में इलाज के लिए आने वाले मरीजों से बाहर से दवाइयां या जीवन-रक्षक टीके (जैसे टिटनेस का इंजेक्शन) मंगवाना नियमों के विरुद्ध और स्वास्थ्य सेवाओं के मानकों के खिलाफ है।
इस मामले में उचित कदम उठाने के लिए आप निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं:
नोट: सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दवाइयां और टीके उपलब्ध कराने का प्रावधान होता है। ऐसे में इमरजेंसी सेवाओं के दौरान बाहर से दवा या इंजेक्शन मंगाना अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
एक जिम्मेदार पत्रकार के रूप में, इस प्रकार की अनियमितताओं को तथ्यों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित या प्रसारित किया जा सकता है ताकि स्वास्थ्य प्रशासन पर दबाव बने और गरीब मरीजों को राहत मिल सके।



