
न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 22 Jan.2026, गुरुवार को देहरादून । बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो प्रकृति के नवजागरण और ज्ञान की आराधना का प्रतीक है। आज के समय में बसंत पंचमी हमें यह संदेश देती है कि समाज का वास्तविक विकास शिक्षा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से ही संभव है। इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की उपासना कर हम ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता के महत्व को स्मरण करते हैं। शीत ऋतु के अंत और बसंत के आगमन के साथ खेतों में लहलहाती फसलें, पीले पुष्प और उत्साह से भरा वातावरण नई ऊर्जा का संचार करता है।वसंत ऋतु में सभी पौधे और फूल खिल उठते हैं। सभी जीव आनंद की अवस्था का अनुभव करते हैं। गुरबानी में इस तथ्य की घोषणा इस प्रकार की गई है:
वसंत ऋतु (फरवरी-मार्च) में कई प्रमुख भारतीय त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें वसंत पंचमी, होली, महाशिवरात्रि, और गुड़ी पड़वा शामिल हैं, जो प्रकृति के पुनर्जन्म और नई ऊर्जा का जश्न मनाते हैं, खासकर देवी सरस्वती की पूजा (वसंत पंचमी पर), रंगों का त्योहार (होली), और फसल कटाई से जुड़े पर्वों (जैसे पोंगल, बैसाखी) के रूप में. बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने वाला सांस्कृतिक संदेश भी है। पीले वस्त्र, सरसों के खेत और पतंगोंसे सजा आकाश उल्लास और एकता का प्रतीक बनता है।
यह पर्व हमें यह भी स्मरण कराता है कि शिक्षा और संस्कार ही सशक्त राष्ट्र की नींव होते हैं। आज के चुनौतीपूर्ण समय में बसंत पंचमी हमें अज्ञान, नकारात्मकता और विभाजन को त्याग कर ज्ञान, सद्भाव और रचनात्मकता को अपनाने की प्रेरणा देती है।
आइए, इस बसंत पंचमी पर हम सभी ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होने, संस्कृति की गरिमा बनाए रखने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प लें। यही इस पावन पर्व का वास्तविक संदेश और सार , आइए, इस अवसर पर अज्ञान, वैमनस्य और नकारात्मकता को त्याग कर ज्ञान, सौहार्द और सकारात्मक सोच को अपनाने का संकल्प लें। यही बसंत पंचमी की सच्ची सार्थकता है।



