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अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रही बूढ़ी दिवाली

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उत्तराखण्ड: 23 नवंबर 2025 रविवार को चंद्राराम राजगुरु संवाददाता की ओर से देहरादून। दिवाली पर्व में दीपमालाओं व पटाखों की गूंज का ख्याल सभी के मन में आता है। मगर भारत के उत्तराखंड व हिमाचल राज्य के पर्वतीय इलाके में एक दीपावली ऐसी भी है जहां पटाखों का शोर व दीपमालाएं नहीं होती, लेकिन लोगों का उत्साह एवं उल्लास देख मन प्रफुल्लित हो जाता है। हम बात कर रहे हैं देहरादून जनपद के जौनसार बावर और हिमाचल के सिरमौर क्षेत्र की। यहां देशवासियों के दीपावली मनाने के ठीक एक माह बाद बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा है। पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं प्राचीन परंपरा के तहत मनाए जाने वाली बूढ़ी दिवाली वर्ष 2019 में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रही, जो क्षेत्रवासियों के लिए गौरव की बात है।

यमुना घाटी व टोंस वैली से जुड़े जौनसार बावर, रंवाई जौनपुर और सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली का परंपरागत जश्न मनाने के पीछे यूं तो अनेक दंत कथाएं प्रचलित है। कहते हैं भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खबर पहाड़ के दूर दराज इलाके में देर से पहुंचने के कारण मार्गशीर्ष अमावस्या को यहां दीपावली मनाई गई जो परंपरा बन गई। यह भी कहा जाता है कि कार्तिक माह में पर्वतीय क्षेत्र में किसान खेती बाड़ी के कामकाज में अत्यधिक व्यस्त रहते हैं जिस कारण दिवाली एक माह बाद मनाई जाती है। फसलों की कटाई के बाद कृषि उपज की कमाई से बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा सदियों से प्रचलित है।

क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली के लोक उत्सव का विशेष सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व है। यहां प्रदूषण रहित दिवाली में स्थानीय लोग ढोल बाजे के साथ चीड़ एवं विमल लकड़ी की मशालें जलाकर पूरी रात मंदिर परिसर व पंचायती आंगन में लोकनृत्य के माध्यम से देवता की स्तुति करते हैं। पहाड़ की परंपरागत बूढ़ी दिवाली में महिलाएं व पुरुष सामूहिक रुप से तांदी, जैंता, रासौ, घुंडिया रासो नृत्य के साथ देवगाथा का वर्णन करते हैं। तीन से पांच दिन तक चलने वाला यह परंपरागत पर्व मार्गशीर्ष अमावस्या को मनाया जाता है, जिसे बूढ़ी दिवाली कहते हैं। आधुनिक दौर में जौनसार बावर व सिरमौर क्षेत्र में जनजाति समाज के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं समृद्ध प्राचीन परंपरा को बचाए हुए हैं।

वर्ष 2019 में मुंबई के बोरीवली वेस्ट के एंड्रयू आडिटोरियम थियेटर में बूढ़ी दिवाली पर बनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग हुई थी। 21 मिनट की इस डाक्यूमेंट्री में टोंस वैली से जुड़े सिरमौर के द्राबिल गांव की बूढ़ी दिवाली का फिल्मांकन किया गया जो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रही।

बूढ़ी दिवाली शार्ट फिल्म को देश-विदेश की दो दर्जन से अधिक शार्ट फिल्मों व डाक्यूमेंट्री के बीच दिखाया गया था। इससे जनजाति समाज की पुरातन संस्कृति एवं लोक उत्सव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली। बूढ़ी दिवाली में स्थानीय लोग ढोल बाजे से होलियात निकालने के बाद बिरुडी व जंदोई त्योहार परंपरागत अंदाज में मनाते हैं। इसमें मेहमान नवाजी को कई तरह के स्थानीय पकवान बनाए जाते हैं। लोक उत्सव का जश्न मनाने को घरों से बाहर गए नौकरी पेशा व अन्य कारोबारी लोग अपने पैतृक गांव लौटते हैं। क्षेत्र के बड़े बुजुर्ग एवं संस्कृति के जानकार समाज की नई पीढ़ी को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। यह पर्व क्षेत्र की सांस्कृतिक विशेषता एवं लोक परंपरा का प्रतीक है, जिसे लोग बड़े उत्साह से मनाते हैं।

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