
उत्तराखंड: 23 Sep. 2026, देहरादून / राजधानी का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल, राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय देहरादून में तैनात कर्मचारियों की कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूत्रो के मुताबिक चिकित्सा शिक्षा निदेशालय द्वारा दून अस्पताल के दो कर्मचारियों—दिनेश रावत और विनोद नैवाल—को चिकित्सा शिक्षा निदेशालय का जनसंपर्क अधिकारी (PRO) नियुक्त किए जाने के बाद से ही विवादों का बाजार गर्म है।
साथ ही निदेशालय का बड़ा दांव या प्रशासनिक लापरवाही? निदेशक चिकित्सा शिक्षा डॉ. आशुतोष सयाना द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इन दोनों कर्मचारियों को निदेशालय में पीआरओ की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनका मुख्य उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेजों के बीच समन्वय स्थापित करना तथा मरीजों को कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देना बताया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना किसी ठोस जनसंपर्क (PR) अनुभव के इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपना क्या विभाग के लिए गले की फांस नहीं बन जाएगा?
विवादों के साए में दून अस्पताल की छवि
राजधानी का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के नाते दून अस्पताल हमेशा से सुर्खियों में रहता है—लेकिन ज्यादातर मामलों में वजहें नकारात्मक ही होती हैं: अव्यवस्था और विवाद: अस्पताल में आए दिन मरीजों के तीमारदारों से बदसलूकी, इलाज में देरी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर हंगामा आम बात है।
सूत्रो के मुताबिक इस अस्पताल की बिगड़ती छवि: इन लगातार सामने आने वाले विवादों के कारण अस्पताल की साख पहले ही जनता की नजरों में धूमिल हो चुकी है। ऐसे में, अनुभवहीन चेहरों को पीआरओ बनाकर क्या इस छवि को सुधारा जा सकेगा, यह एक बड़ा यक्षप्रश्न है।
सूत्रो की माने तो उपनल कर्मचारियों के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड पर संदेह-स्थानीय लोगों और अस्पताल के जानकारों का दबी जुबान में यही कहना है कि यदि इन दोनों उपनल कर्मचारियों के पिछले कार्यकालों और कार्यप्रणाली का मूल्यांकन किया जाए, तो उनकी क्षमता पर संदेह होना स्वाभाविक है। क्या जो कर्मचारी अपने मूल पदों पर रहते हुए प्रशासनिक कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए, वे अब निदेशालय स्तर के संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण पीआरओ पद पर न्याय कर पाएंगे?
मरीजों की वास्तविक समस्याओं को दूर करने के बजाय क्या यह नियुक्ति महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
अस्पताल को न पड़ जाएं लेने के देने!
जनसंपर्क अधिकारी का पद केवल कागजी आदेशों या वाहवाही तक सीमित नहीं होता; इसके लिए संकट प्रबंधन (Crisis Management), मीडिया समन्वय और जनहित के प्रति गहरी संवेदना की आवश्यकता होती है। यदि शुरुआती अनुभव के बिना ऐसे अहम पदों पर नियुक्तियां होती रहीं, तो यह सुधार की बजाय “उल्टी गंगा बहने” जैसा साबित होगा, जिससे अस्पताल की व्यवस्था सुधरने के बजाय और अधिक गर्त में जा सकती है।
अब देखना यह होगा कि क्या ये दोनों नए पीआरओ अपनी कार्यकुशलता से आलोचकों के मुंह बंद कर पाते हैं, या फिर यह फैसला दून अस्पताल के लिए एक और प्रशासनिक नाकामी साबित होता है? इस पूरे घटनाक्रम और नई नियुक्तियों को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि ये दोनों कर्मचारी इस बड़ी जिम्मेदारी पर खरे उतरेंगे?



