
न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 23 Jan.2026, शुक्रवार को देहरादून । संपादकीय……पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज के समय में पत्रकारिता का मज़ाक बनता जा रहा है। जिस किसी के हाथ में मोबाइल आया, वह खुद को पत्रकार घोषित कर लेता है। मोबाइल उठाया, लाइव किया और कह दिया—हम पत्रकार हैं। हालात यह हो गए हैं कि कुछ लोग अपने स्तर पर ही तथाकथित “प्रेस क्लब” घोषित कर रहे हैं। हर कोई नया-नया प्रेस क्लब बना रहा है, बिना किसी मानक, बिना किसी जवाबदेही के। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—यह प्रेस क्लब हैं या मज़ाक?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि कई तथाकथित पत्रकारों को अपना नाम तक सही से लिखना नहीं आता। ऐसे में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह पत्रकारिता है या उसका उपहास। सरकार ने प्रेस क्लब इसलिए बनाए थे कि पढ़े-लिखे, जागरूक और जिम्मेदार पत्रकारों को एक मंच मिल सके। इसके लिए जमीन और धन तक आवंटित किया गया, लेकिन आज कई प्रेस क्लबों में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं है।
आज स्थिति यह है कि बस एक अखबार निकालो, चाहे वह नियमित हो या नहीं, और प्रेस क्लब की सदस्यता पा लो। अगर सरकार यह अनिवार्य कर दे कि किसी भी पत्रकार की योग्यता क्या है, उसने कहां-कहां रिपोर्टिंग की है, और क्या उसने अपने अखबार में कभी संपादकीय लिखा है, तो तस्वीर कुछ हद तक बदल सकती है। कम से कम प्रेस क्लबों के लिए यह निर्देश तो पारित होने चाहिए कि वहां शामिल होने वाले पत्रकार मास कम्युनिकेशन या पत्रकारिता में स्नातक हों, ताकि इस पेशे की गरिमा बनी रहे।
आज की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा “लिफाफा संस्कृति” पर निर्भर हो चुका है। कार्यक्रमों में जाना, लिफाफा लेना और खबर छाप देना—यही पत्रकारिता की पहचान बनती जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यही पत्रकारिता है, या फिर उसके नाम पर चल रहा एक बड़ा मज़ाक?
दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह भी है कि आज कई लोग पत्रकारिता का इस्तेमाल केवल निजी लाभ के लिए कर रहे हैं। कोई इसे राजनीति की सीढ़ी बना रहा है, तो कोई सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहकर अपनी निजी जिंदगी को आसान बना रहा है। उन्हें न तो जन-जागरूकता से मतलब है और न ही समाज की समस्याओं से। उद्देश्य केवल पैसा कमाना और सरकारी विज्ञापन हासिल करना रह गया है।



