
उत्तराखंड: 08 FEB.2026, रविवार को देहरादून । डॉ रवि शरण दीक्षित प्रोफेसर डी ए वी, (पीजी) कॉलेज,देहरादून के मुताबिक भारतीय ज्ञान परंपरा को उत्कृष्ट करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाने वाला कदम है । इसमें चरणबद्ध तरीके से गुणात्मक सुधार किये जा रहे हैं। जिसका उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को समाज के सामने लाना और आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शामिल करना है। यह नीति भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को समझते हुए, इसे शिक्षा प्रणाली में शामिल करने के लिए कई पहलुओं पर जोर देती है।
– राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वेद, उपनिषद, रामायण, और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन को बढ़ावा देने की बात कही गई है। साथ ही साथ इस ज्ञान परंपरा को जन सामान्य तक पहुंचने में शिक्षा नीति महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है।
– संस्कृत भाषा को शिक्षा प्रणाली में शामिल करने और इसके अध्ययन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। उत्तराखंड जैसे राज्य इसके प्रोत्साहन के लिए सतत प्रयासरत है।
– आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा ,भारतीय ज्ञान परंपरा में आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा के महत्व को समझते हुए, इसे शिक्षा प्रणाली में शामिल कर छात्र जीवन से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में प्रभावशाली भूमिका अदा करती है । जिस जिसके द्वारा वह अपने जीवन में समाज के प्रति, देश के प्रति एक नागरिक के कर्तव्य निभाने में सफल होगा ।
– स्थानीय ज्ञान और संस्कृति स्थानीय ज्ञान और संस्कृति को शिक्षा प्रणाली में शामिल करने और इसके महत्व को समझने पर जोर दिया गया है । यह बात समझने अत्यधिक आवश्यक की साम्राज्यवादी लेखन ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर जबरदस्त चोट की थी और यहां तक प्रसारित हुआ की सभी कपोल कल्पनाएं हैं,और ज्ञान एक छोटी सी अलमारी के बराबर है ।
– वर्तमान परिवेश में इस सोच को खत्म करते हुए भारतीय चिंतन की वैज्ञानिकता को प्रमाणिकता के साथ प्रसारित किया जा रहा है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था में नालंदा तक्षशिला भोजशाला विक्रमशिला और वल्लभी का अत्यधिक महत्व है। उदाहरण के तौर पर प्राचीन समय से ही ज्ञान के प्रवाह की देवी के रूप में मां सरस्वती का पूजन किया जाता है । तथा राजा भोज के समय मे वाग्देवी जो सरस्वती का दूसरा नाम है,वाणी उच्चारण और विद्या की देवी के रूप में वर्णन मिलता है । और यही सांस्कृतिक विरासत साम्राज्यवादी सोच पर चोट करते हुए भारतीय अद्भुत ज्ञान परंपरा को विश्व के सामने रख रही है ।
– राष्ट्रीय शिक्षा नीति, समग्र शिक्षा पर जोर देती है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक विकास शामिल है।
– : नीति में बहुविषयक शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही गई है, प्राचीन समय गणित खगोल विज्ञान आयुर्वेद,धनुर्वेद,युद्ध कला, संगीत शिल्प राजनीति में जिससे छात्रों को सहित विषयों में ज्ञान दिया जाता था। शिक्षा नीति भी इसी प्रयास में अग्रसर है कि भारतीय परंपराओं के वाहक के रूप में ज्ञान को आगे ले जाए ।
– कौशल-आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है, जिससे छात्रों को रोजगार के अवसर मिल सकें ब्रिटिश शासन से पूर्व पढ़ाई जाने वाले विषयों की अगर सूची देखी जाती है तो यह अतुलनीय है, और यही अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति के द्वारा समाज के सामने धीमे-धीमे आ रही है, और अंत में साम्राज्यवादी सोच का एक उदाहरण भारतीय शेक्सपियर कालिदास को कहा जाता है । जबकि कालिदास के लेखन और समय काल की दृष्टि से कालिदास पहले भी थे और अतुलनीय थे। इस सोच ने कालिदास के कद को तो घटाया शेक्सपियर के कद को बढ़ा दिया ।आवश्यकता राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पूर्णता अनुपालन की है, और समय की आवश्यकता के अनुसार प्रतिबद्धता के साथ लागू करते हुए गुणात्मक सुधार करने की आवश्यकता है ।
डॉ रवि शरण दीक्षित एसोसिएट प्रोफेसर
डी ए वी, (पीजी कॉलेज), देहरादून



